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Pravin Kumar Karn

IMG_1080मोती के बूंद सा
पल पल सजा जिन्दगी का धार|

हंसोहंसाओ और मुस्कुराओ
करो जीवन का सोलह सिंगार|

झूम के गाओ नाचो
ये जीवन है राग मल्हार|

पतझर में न उदास हो
आगे फिर है मौसम बहार|

माँ

मै फिर जीना चाहता हूँ

तेरी आँचल के छाओ तले

मै फिर सोना चाहता हूँ

माँ मै फिर जीना चाहता हूँ

 

लर झगर के यारो दोस्तों से

रोते बिलक ते

माँ फिर तेरी गोदी में खो जाना चाहता हूँ

माँ मै फिर जीना चाहता हूँ

 

करके फिर कोई सैतानी

करके फिर कोई मनमानी

माँ फिर तुझे रुलाना चाहता हूँ

माँ मै फिर जीना चाहता हूँ

 

फिर रोके भूख से

फिर होके नाराज सब से

माँ फिर तेरे हाथो से खाना चाहता हूँ

माँ मै फिर जीना चाहता हूँ

 

माँ तेरी ममता के छाओ में

माँ तेरी यादो में

बन के तेरा अक्स

माँ मै खुस रहना चाहता हूँ

 

माँ मै फिर जीना चाहता हूँ

माँ मै फिर जीना चाहता हूँ

 

जीवन मैं एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था

वह डूब गया तो डूब गया
अम्बर के आँगन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे

जो छूट गए फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अम्बर शोक मनाता है
जो बीत गयी सो बात गयी

जीवन मैं वह था एक कुसुम
थे उस पर नित्य निछावर तुम

वह सूख गया तो सूख गया
मधुवन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियाँ
मुरझाई कितनी बगियाँ

जो मुरझाई वोह फिर कहाँ खिली
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुबन शोर मचाता है
जो बीत गयी सो बात गयी

जीवन मैं मधु का प्याला था
तुम ने तन मन दे डाला था

वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय के आँगन को देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिटटी मैं मिल जाते हैं

जो गिरते हैं कब उठते हैं
पर बोलो टूटे प्यालो पर
कब मदिरालय पछताता है
जो बीत गयी सो बात गयी

मृदु मिटटी के हैं बने हुए
मधु घुट फूटा ही करते हैं

लघु जीवन लेकर आये हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फिर भी मदिरालय के अन्दर
मधु के घाट है मधु प्याले हैं

जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
व कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घाट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है
जो बीत गयी सो बात गयी

बो दिल है मेरा,
और मुझे जिगर ने पाला है|
मेरे लिए जरुरी है
मैं दिल से प्यार करू
और जिगर के साथ रहूँ|

पर मैं जनता हूँ,
आएगा एक दिन ऐसा
जब होगी घमासान
मेरे अपनों के बिच|

बाँट जाएगी पूरी दुनिया
दो अलग अलग पाटो में,
ठन जाएगी लड़ाई,
मेरे दिल और जिगर के बिच|
और मुझे करना परेगा चुनाब

जीने के लिए
होना परेगा एक के साथ,

या दिल को तोर कर,
या जिगर को छोर कर|

एक बूंद का प्यास,
जो समंदर से न बुझ सका|
एक अधुरा ख्वाब,
जो आँखों से न हट सका|

छोर आया हूँ उसे मैं आज पीछे,
अनजानी डगर पर आँख मिचे|
नयी मंजिल को पंहुचा हु,
न जाने क्या क्या छोर पीछे|

पुराने ख्वाबो को,
नए सपनो से ढक लिया है मैंने|
पुराने निब पर,
नया महल बना दिया है मैंने|
रौशनी जो आँखों को अन्धा करदे,
ऐसी चराग बुझा दिया है मैंने|
न पूछ एक खुसी के खातिर,
कितने गम उठा लिया है मैंने|

न जाने चाँद कब उतर आये जमीं पर,
तुम सो जाओ मैं जागूँगा सुबह होने तक|
गम और खुसी, पतझर और बहार एक सिस्ल्सिला है,
एक के बाद एक आती है आदमी के मर जाने तक|
क्या पता किस ने देखा है उसे कैसा है वो,
हम खवाबो में बुलाएँगे उसे सपने टूट जाने तक|
बिखरे परे है सूखे दरख्तों के पते यहाँ वहां,
चलो बहारो के खवाब सजाये बहार आने तक|
आज आरजू है तुझ को समझाने आया हूँ,
क्या पता ये खावाहिस जिन्दा रहे न रहे तुझ को समझ आने तक|
बैठा हूँ खवाब सजाये, साँस रोके, दिल को थामे हुए,
जहाँ कहा था तुमने, इन्त्जात करो मेरा, मेरे वापस आने तक|
मना है दूर बो, न पहुचेगा मेरा अश्क वहां,
मैं बैठा हु यहाँ रोने उसको खबर होने तक|
तुम्हे पूजता हूँ मैं, दिल में हो तुम मेरे,
तुम जिन्दा हो मेरे साथ, मेरा सांस होने तक|
हे भगवन तुम मालिक हो तीनो जाहन के,
देखू क्या हाल होता है मेरा, तुम्हे मेरी याद आने तक|

दो किनारे By Pravin kumar karn

नदी के दो किनारे

अगर मिल जाये तो?

तो मिट जायेगा अस्तित्व

नदी और किनारे दोनों की

और

हो जाएगी अनाथ

नदी की कोख का पानी

किनारे के बंधन से मुक्त

निकल परेगी

अनजानी अनदेखी राहोंपे

भटकने के लिए

इसलिए जरुरी है

किनारे कभी न मिले

हमेश हमेशा के लिए|

मर के भी राबन
न मर पाया राम से|
मर के भी राबन
जित गया राम से|

हँसता है राबन
जब जलती है सीता,
कुसुम कोमल जब
देती है अग्नि परीछा|
मर के भी राबन
जीता है राम के मन में|

मर के भी राबन
न मरा राम से|

जुवां बन के राबन
बोलता है धोबिके मुखसे,
हरता है सीता को
भरे पुरे अबाध से,
करता है अत्याचार राबन,
राम के हृदय से|

मर के भी राबन
न मरा राम से|

चलो हाथ से हाथ मिलाये राम के
मिल के निकाले राबन अपने ह्रदय से,
न करे अत्याचार कभी
अपने हृदय से|

चलो मिल के जीत जाए
हम राबन से,
जीते मन के राबन से
स्वचाता सद्भाव से|
स्वचाता सद्भाव से|

स्वपन-प्रिया

तुम बिन सच कितना
खाली सा
मेरे मन का जोगी दर्पण

तुम चाहो तो
तोड़ के बंधन
मेरे मन के गीत सजा दो
तुम चाहो तो
प्रीत निवेदन
मेरा इक पल में ठुकरा दो !

टूट न जाए
संयम मनका
कुछ मनके संयम के गुथना
जब तक मेरी
नींद न टूटे
मेरे सपन में बस तुम रुकना !

स्वपन प्रिया ये
दुनिया झूठी
हम-तुम को न सह पाएगी
अपने पावन
नातों को यह
जाने क्या-क्या कह जाएगी

टूट न जाए,
संयम मनका
कुछ मनके
संयम के गुथना,
जब तक जारी
-”सपन सवारी”
चिंतन का घट पूरन रखना !

मुह की बात सुने हर कोई

मन की बात को जाने कौन|

 

 हर तरफ है आवाजो की भीर

इसमें खामोसी पहचाने कौन|

 

 जख्मो भरा है ये सफ़र

 किस को मरहम लगाये कौन|

 

 अबके बिछरे जाने अब कब मिले

 किसे भूले और किसे याद आये कौन|

 

 मुह में महोबत हाथ में खंजर

 यहाँ अपना कौन पराया कौन|

 

 सुबह हुवा उर गया पंछी

 अब रात के साथी पहचाने कौन|

 

 ये दिल था तेरा रैन बसेरा

 अब बिराने में दिया जलाये कौन|

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