March 27, 2009 by pravinkarn
मेरा ख्याल था ऐ दिन
तुम कुछ इस तरह मीलोगे
मैं रात के साये से डर के
तुम्हारा इन्तजार करूँगा
तेरे लिए सपनो का महल बनाऊंगा
फिर हर तरफ रोशनी होंगी
तेरे रोशनी में हर बाग़ खिल उठेंगे|
तुम मिले तो कुछ इस तरह
तुझ में इतनी गर्मी थी की
बार के बाग़ जल उठे
सारे सपनो का जनाजा निकला
तू खुद सबसे बरा धोका निकला
मैं तुझ से डरने लगा
रात का इन्तजार करने लगा
इस आस में के सायद
रात में इतनी गर्मी न होंगी
नहीं महल जलेंगे रात में
न मुर्झायेगी कोई कलि सायद
नहीं बाग़ जलेंगे रात में|
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March 1, 2009 by pravinkarn
मुझ से बिछर के तू
मेरे और करीब आगया है
मेरे नजरो से ओझल तू
मेरे दिल में समा गया है|
एक एक कतरा खुसी
तुने संजोये मेरे लिए
मेरे दुखो में अपने
आँख भिगोये मेरे लिए
आज नजर बन के तू
मेरे आँखों में समां गया है|
आज बन के तू आस्मा
मुझ पे प्यार बरसा रहा है
बदलो की गरज के साथ
तू मुझे बुला रहा है
बन के मेरा अक्स तू
आईने में समां गया है
मुझे से बिछर के तू मेरे
और करीब आगया है|
आज भी महसूस करता हूँ तुझे
अपने दिल की धरकनो में
पाता हु आज भी तुझे
अपने मन की आँगन में|
आज बन के याद तू
मेरे दिलो जान पे छा गया है
अपने बदन के नस नस में
मैंने पाया है तुझे
सांसो की हर शोर में
मैंने बुलया है तुझे
हर तरफ हर वक्त
तू नजर आया है मुझे
तुझे खो के
अपने और करीब पाया है तुझे
बन के जादू तू
दुनिया के हर एक सय में समा गया है
मुझ से बिछर के तू मेरे और करीब आगया है|
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February 13, 2009 by pravinkarn
जाने के दिन मैं यही बात कहता जाऊं की जो कुछ मैंने
देखा, पाया, उसकी उपमा नहीं थी||
इस प्रकाशमय सरोबर के कमल का मधुर मधु मैंने चखा है,
मैं उसे पीकर धन्य हुआ हूँ|
बिश्व के क्रीडागृह में मैंने अनेक खेल खेले है, दोनों नेत्रों से
मैंने अमित सौन्दर्य का पान किया है|
जिसका स्पर्स अस्म्भब है, उसने मेरे शरीर
में समाकर मेरे प्राणों को पुलकित किया है|
अब यहीं मेरा अंत करना चाहते है, तो कर दे-
जाने के दिन मैं यही घोषित करू की जो कुछ मैंने
देखा व पाया है वह अतुल्य है|
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January 31, 2009 by pravinkarn
कोई दीवाना कहता है, कई पागल समझता है|
मगर धरती के बैचैनी को बस बादल समझता है|
मैं तुझेसे दूर कैसा हूँ, तू मुझसे दूर कैसी है|
ये तेरा दिल समझाता है, ये मेरा दिल समझता है|
मोहबत एक अहसासों की पावन कहानी है;
कभी कबीरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है|
यहाँ सब कहते है मेरे आँखों में आंसू है,
जो तू समझे तो मोती है जो न समझे तो पानी है|
समंदर पीर का अन्दर है लेकिन रो नहीं सकता,
ये आंसू प्यार के मोती है इसको खो नहीं सकता|
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले,
जो मेरा हो नहीं पाया वो तेरा ह नहीं सकता|
भ्रमर कोई कुमुदिनी पर मचल बैठा तो हंगामा,
हमारे दिल में कोई खवाब पल बैठा तो हंगामा,
अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा महोबत का,
मैं किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा|
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January 1, 2009 by pravinkarn
बात करने से फिर बात बढ़ ही जायेगी,
यूँही खामोस नहीं, यूँही तो उदास नहीं|
कैसे कह सकती हूँ बो दिल के आस पास नहीं
किसी चिनार तले खवाब जो दफनाया था
कहूँ या ना की कोई खवाब मुझे रास नहीं|
कहने पे आये तो बातें कहाँ पहुचे जाने?
कितने अफ़साने बने कितने हम सुने ताने
बात इतनी सी बस इतनी ही रहने दीजे
ख्वाब ना रास मुझे खवाब अब रहने दीजे
बात करने से फिर बात बढ़ ही जायेगी,
मुख्तासिर बातें तेरी सोच कितनी देती है
जेहन की खिड़किया जो बंद थी खुल जाती है,
आती है ऐसी हवा जो मुझे रास नहीं,
ख्वाब पालते है वो हवाए जो मुझे रास नहीं|
तुझ से मैं दूर रहूँ ये बहुत बेहतर होगा
खवाब कोई न कभी जेहन में रोसन होगा,
एक अँधेरे में जिए जाना ही आसान कितना,
बंद करो खिड़की इस से याद कोई आती है,
बात करने से फिर बात बढ़ ही जायेगी,
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December 31, 2008 by pravinkarn
दीवारों से लड़ता हूँ
ख़ुद से बातें करता हूँ
तुम जब से गए हो
जाने कितनी मौतें मरता हूँ
याद है तुम्हारी वो हंसी
जो छाओ थी मेरी धूप की
वो पलकें बिछाना तुम्हारा मेरे लिए
और मेरा उस प्यार को देख न पाना
लड़ता था तुमसे
गुस्सा होता था, चिढ भी जाता था अक्सर
लेकिन प्यार बहुत था
अब दीवारों से लड़ता हूँ
ख़ुद से बातें करता हूँ
प्यार का मतलब और प्यार का मकसद
दोनों समझ नहीं आते मुझे
सीधा सा आदमी हूँ
बस इतना जानता हूँ की
तुमसे ही मुस्कान मेरी, तुमसे ही आंसू
तुम नहीं हो ना जो अब पास
तो अकसर रोता भी हूँ
दीवारों से लड़ता हूँ
तुमसे बातें करता हूँ
तुमसे नहीं कहा कभी
लेकिन जानता हूँ की ग़लत हूँ मैं
माफ़ तुमने पहले भी किया है मुझे
तो एक बार और सही
आ जाओ ना
दीवारों से लड़ता हूँ
ख़ुद से बातें करता हूँ
तुम जब से गए हो
जाने कितने मौतें मरता हूँ ।
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December 22, 2008 by pravinkarn
“बिपतियों से रछा कर” – यह मेरी प्राथना नहीं,
मैं बिपतियों से भयभीत न होऊं!
अपने दुःख से ब्यथित चित को सांत्वना देने की भिछा
नहीं मांगता, मैं दुखो पे बिजय पाऊं !
यदि सहयता न जुटे तो भी मेरा बल न टूटे|
संसार से हनी ही मीले, केवल बांचना ही पाऊं
तो भी मेरा मन उसे छति न माने!
“मेरा त्राण कर” यह प्राथना नहीं,
मेरी तैरने को शक्ति बनी रहे|
मेरा भार हल्का करके मुझे सांत्वना न दे,
यह भार बहन करके चलता रहूँ|
सुख भरे छनो में नतमस्तक मैं तेरा मुख पहचान पाऊं,
किन्तु दुःख -भरी रातों में जब सारी दुनिया मेरी बांचना करे,
तब भी मैं तेरे प्रति शंकित न होऊं!
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December 7, 2008 by pravinkarn
मैं अनेक बास्नाओ को प्राणपन से चाहता हूँ,
तुने मुझे उनसे बंचित रख, बचा लिया|
तेरी यह निष्ठुर दया मेरे जीवन के कण कण में ब्याप्त है|
तुने आकास, प्रकाश,देह, मन, प्राण, बिना मांगे दिए है|
प्रतिदिन तू मुझे इस महादान के योग्य बना रहा है|
अति इच्छा के संकट से उबार कर|
मैं कभी रह भुला सा, कभी तेरी रह पकडे-सा
तेरी ओर लछित चलता हूँ|
निष्ठुर!तू मेरी आँखों की ओटहो जाता है|
यह तेरी दया है, इस रहस्य को मैं जान गया|
तू मुझे अपनाने के लिए ठुकराता है|
मेरा जीबन परिपूर्ण करके तू अपने योग्य बना रहा है|
अधूरी इच्छाओ के संकट से उबरकर|
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October 15, 2008 by pravinkarn
सूनी-सूनी ज़िंदगी की राह है,
भटकी-भटकी हर नज़र-निगाह है,
राह को सँवार दो,
निगाह को निखार दो,
आदमी हो तुम कि उठो आदमी को प्यार दो,
रोते हुए आँसुओं की आरती उतार दो।
तुम हो एक फूल कल जो धूल बनके जाएगा,
आज है हवा में कल ज़मीन पर ही आएगा,
चलते व़क्त बाग़ बहुत रोएगा-रुलाएगा,
ख़ाक के सिवा मगर न कुछ भी हाथ आएगा,
ज़िंदगी की ख़ाक लिए हाथ में,
बुझते-बुझते सपने लिए साथ में,
रुक रहा हो जो उसे बयार दो,
चल रहा हो उसका पथ बुहार दो।
आदमी हो तुम कि उठो आदमी को प्यार दो,
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September 7, 2008 by pravinkarn
मुस्कुराहटो के बीच एक थकन सी है |
हर पल में एक चुभन सी है|
न जाने कहा को चला है ये करवा
हर हमसफ़र के चेहरे पे एक उलझन सी है|
मंजिल है क्या, कौन सा रास्ता है आगे
जहां निगाह जाये सुखी जंगल सी है|
हर जुवान से निकलती है अपनी दास्ताँ
हर दिल में छुपी एक जलन सी है|
वो दोस्त आरहे है मिलने आज मुदत के बाद
उनके हाथो में छुपी खंजर सी है|
टुटा कुछ सिने में तो क्या बनता ये दास्ताँ
आज जिधर देखो यही मंजर सी है|
आज फिर आरजूवो ने दिल में डेरा डाला है
आज फिर दिल में एक हलचल सी है|
आज भटकते भटकते मैं जाऊं कहाँ
हर तरफ तेरे आँखों की मंजर सी है||
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