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Pravin Kumar Karn

IMG_1080मोती के बूंद सा
पल पल सजा जिन्दगी का धार|

हंसोहंसाओ और मुस्कुराओ
करो जीवन का सोलह सिंगार|

झूम के गाओ नाचो
ये जीवन है राग मल्हार|

पतझर में न उदास हो
आगे फिर है मौसम बहार|

स्वपन-प्रिया

तुम बिन सच कितना
खाली सा
मेरे मन का जोगी दर्पण

तुम चाहो तो
तोड़ के बंधन
मेरे मन के गीत सजा दो
तुम चाहो तो
प्रीत निवेदन
मेरा इक पल में ठुकरा दो !

टूट न जाए
संयम मनका
कुछ मनके संयम के गुथना
जब तक मेरी
नींद न टूटे
मेरे सपन में बस तुम रुकना !

स्वपन प्रिया ये
दुनिया झूठी
हम-तुम को न सह पाएगी
अपने पावन
नातों को यह
जाने क्या-क्या कह जाएगी

टूट न जाए,
संयम मनका
कुछ मनके
संयम के गुथना,
जब तक जारी
-”सपन सवारी”
चिंतन का घट पूरन रखना !

मुह की बात सुने हर कोई

मन की बात को जाने कौन|

 

 हर तरफ है आवाजो की भीर

इसमें खामोसी पहचाने कौन|

 

 जख्मो भरा है ये सफ़र

 किस को मरहम लगाये कौन|

 

 अबके बिछरे जाने अब कब मिले

 किसे भूले और किसे याद आये कौन|

 

 मुह में महोबत हाथ में खंजर

 यहाँ अपना कौन पराया कौन|

 

 सुबह हुवा उर गया पंछी

 अब रात के साथी पहचाने कौन|

 

 ये दिल था तेरा रैन बसेरा

 अब बिराने में दिया जलाये कौन|

मेरा ख्याल था ऐ दिन
तुम कुछ इस तरह मीलोगे

मैं रात के साये से डर के
तुम्हारा इन्तजार करूँगा
तेरे लिए सपनो का महल बनाऊंगा

फिर हर तरफ रोशनी होंगी
तेरे रोशनी में हर बाग़ खिल उठेंगे|

तुम मिले तो कुछ इस तरह
तुझ में इतनी गर्मी थी की
बार के बाग़ जल उठे
सारे सपनो का जनाजा निकला
तू खुद सबसे बरा धोका निकला

मैं तुझ से डरने लगा
रात का इन्तजार करने लगा

इस आस में के सायद
रात में इतनी गर्मी न होंगी
नहीं महल जलेंगे रात में
न मुर्झायेगी कोई कलि सायद
नहीं बाग़ जलेंगे रात में|

 

 

 

मुझ से बिछर के तू
मेरे और करीब आगया है
मेरे नजरो से ओझल तू
मेरे दिल में समा गया है|

एक एक कतरा खुसी
तुने संजोये मेरे लिए
मेरे दुखो में अपने
आँख भिगोये मेरे लिए

आज नजर बन के तू
मेरे आँखों में समां गया है|

आज बन के तू आस्मा
मुझ पे प्यार बरसा रहा है
बदलो की गरज के साथ
तू मुझे बुला रहा है

बन के मेरा अक्स तू
आईने में समां गया है
मुझे से बिछर के तू मेरे
और करीब आगया है|

आज भी महसूस करता हूँ तुझे
अपने दिल की धरकनो में
पाता हु आज भी तुझे
अपने मन की आँगन में|

आज बन के याद तू
मेरे दिलो जान पे छा गया है

अपने बदन के नस नस में
मैंने पाया है तुझे
सांसो की हर शोर में
मैंने बुलया है तुझे

हर तरफ हर वक्त
तू नजर आया है मुझे
तुझे खो के
अपने और करीब पाया है तुझे

बन के जादू तू
दुनिया के हर एक सय में समा गया है
मुझ से बिछर के तू मेरे और करीब आगया है|

 

 

जाने के दिन मैं यही बात कहता जाऊं की जो कुछ मैंने
देखा, पाया, उसकी उपमा नहीं थी||
इस प्रकाशमय सरोबर के कमल का मधुर मधु मैंने चखा है,
मैं उसे पीकर धन्य हुआ हूँ|
बिश्व के क्रीडागृह में मैंने अनेक खेल खेले है, दोनों नेत्रों से
मैंने अमित सौन्दर्य का पान किया है|
जिसका स्पर्स अस्म्भब है, उसने मेरे शरीर
में समाकर मेरे प्राणों को पुलकित किया है|
अब यहीं मेरा अंत करना चाहते है, तो कर दे-
जाने के दिन मैं यही घोषित करू की जो कुछ मैंने
देखा व पाया है वह अतुल्य है|

कोई दीवाना कहता है, कई पागल समझता है|
मगर धरती के बैचैनी को बस बादल समझता है|

मैं तुझेसे दूर कैसा हूँ, तू मुझसे दूर कैसी है|
ये तेरा दिल समझाता है, ये मेरा दिल समझता है|

मोहबत एक अहसासों की पावन कहानी है;
कभी कबीरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है|
यहाँ सब कहते है मेरे आँखों में आंसू है,
जो तू समझे तो मोती है जो न समझे तो पानी है|

समंदर पीर का अन्दर है लेकिन रो नहीं सकता,
ये आंसू प्यार के मोती है इसको खो नहीं सकता|
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले,
जो मेरा हो नहीं पाया वो तेरा ह नहीं सकता|

भ्रमर कोई कुमुदिनी पर मचल बैठा तो हंगामा,
हमारे दिल में कोई खवाब पल बैठा तो हंगामा,
अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा महोबत का,
मैं किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा|

बात करने से फिर बात बढ़ ही जायेगी,
यूँही खामोस नहीं, यूँही तो उदास नहीं|
कैसे कह सकती हूँ बो दिल के आस पास नहीं
किसी चिनार तले खवाब जो दफनाया था
कहूँ या ना की कोई खवाब मुझे रास नहीं|

कहने पे आये तो बातें कहाँ पहुचे जाने?
कितने अफ़साने बने कितने हम सुने ताने
बात इतनी सी बस इतनी ही रहने दीजे
ख्वाब ना रास मुझे खवाब अब रहने दीजे

बात करने से फिर बात बढ़ ही जायेगी,

मुख्तासिर बातें तेरी सोच कितनी देती है
जेहन की खिड़किया जो बंद थी खुल जाती है,
आती है ऐसी हवा जो मुझे रास नहीं,

ख्वाब पालते है वो हवाए जो मुझे रास नहीं|

तुझ से मैं दूर रहूँ ये बहुत बेहतर होगा
खवाब कोई न कभी जेहन में रोसन होगा,
एक अँधेरे में जिए जाना ही आसान कितना,
बंद करो खिड़की इस से याद कोई आती है,

बात करने से फिर बात बढ़ ही जायेगी,

दीवारों से लड़ता हूँ
ख़ुद से बातें करता हूँ

तुम जब से गए हो

जाने कितनी मौतें मरता हूँ

याद है तुम्हारी वो हंसी

जो छाओ थी मेरी धूप की

वो पलकें बिछाना तुम्हारा मेरे लिए

और मेरा उस प्यार को देख न पाना

लड़ता था तुमसे

गुस्सा होता था, चिढ भी जाता था अक्सर

लेकिन प्यार बहुत था

अब दीवारों से लड़ता हूँ

ख़ुद से बातें करता हूँ

प्यार का मतलब और प्यार का मकसद

दोनों समझ नहीं आते मुझे

सीधा सा आदमी हूँ

बस इतना जानता हूँ की

तुमसे ही मुस्कान मेरी, तुमसे ही आंसू

तुम नहीं हो ना जो अब पास

तो अकसर रोता भी हूँ

दीवारों से लड़ता हूँ

तुमसे बातें करता हूँ

तुमसे नहीं कहा कभी

लेकिन जानता हूँ की ग़लत हूँ मैं

माफ़ तुमने पहले भी किया है मुझे

तो एक बार और सही

आ जाओ ना

दीवारों से लड़ता हूँ

ख़ुद से बातें करता हूँ

तुम जब से गए हो

जाने कितने मौतें मरता हूँ ।

“बिपतियों से रछा कर” – यह मेरी प्राथना नहीं,
मैं बिपतियों से भयभीत न होऊं!

 
अपने दुःख से ब्यथित चित को सांत्वना देने की भिछा
नहीं मांगता, मैं दुखो पे बिजय पाऊं !

 

यदि सहयता न जुटे तो भी मेरा बल न टूटे|
संसार से हनी ही मीले, केवल बांचना ही पाऊं
तो भी मेरा मन उसे छति न माने!

 

“मेरा त्राण कर” यह प्राथना नहीं,
मेरी तैरने को शक्ति बनी रहे|

 

मेरा भार हल्का करके मुझे सांत्वना न दे,
यह भार बहन करके चलता रहूँ|

 

सुख भरे छनो में नतमस्तक मैं तेरा मुख पहचान पाऊं,
किन्तु दुःख -भरी रातों में जब सारी दुनिया मेरी बांचना करे,
तब भी मैं तेरे प्रति शंकित न होऊं!

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