तुम क्या समझो गे मुझे,
तुम तो मुझे आईने की तरह देखा है|
माघ मास की सर्द सुबह में
तुम ने मुहे नर्म धुप की तरह देखा है|
रेतीली अँधेरी आंधियो में
तुमने मुझे आसरे की तरह देखा है|
जेठ मास की गर्म धुप में
तुम ने मुझे बदलो की तरह देखा है|
तुम्हे क्या मालूम हालात ये मेरे दिल की
तुम ने तो [...]
Archive for May, 2008
तुम क्या समझो गे मुझे, :-लेखक : प्रवीन कुमार कर्ण
Posted in My Own on May 18, 2008 | Leave a Comment »
उनको ये शिकायत है.. … लेखक : अज्ञात
Posted in Great Poem colletion on May 11, 2008 | Leave a Comment »
उनको ये शिकायत है.. मैं बेवफ़ाई पे नही लिखता,
और मैं सोचता हूँ कि मैं उनकी रुसवाई पे नही लिखता.’
‘ख़ुद अपने से ज़्यादा बुरा, ज़माने में कौन है ??
मैं इसलिए औरों की.. बुराई पे नही लिखता.’
‘कुछ तो आदत से मज़बूर हैं और कुछ फ़ितरतों की पसंद है ,
ज़ख़्म कितने भी गहरे हों?? मैं उनकी दुहाई पे [...]