मुस्कुराहटो के बीच एक थकन सी है |
हर पल में एक चुभन सी है|
न जाने कहा को चला है ये करवा
हर हमसफ़र के चेहरे पे एक उलझन सी है|
मंजिल है क्या, कौन सा रास्ता है आगे
जहां निगाह जाये सुखी जंगल सी है|
हर जुवान से निकलती है अपनी दास्ताँ
हर दिल में छुपी एक जलन सी है|
वो दोस्त आरहे है मिलने आज मुदत के बाद
उनके हाथो में छुपी खंजर सी है|
टुटा कुछ सिने में तो क्या बनता ये दास्ताँ
आज जिधर देखो यही मंजर सी है|
आज फिर आरजूवो ने दिल में डेरा डाला है
आज फिर दिल में एक हलचल सी है|
आज भटकते भटकते मैं जाऊं कहाँ
हर तरफ तेरे आँखों की मंजर सी है||
आज भटकते भटकते मैं जाऊं कहाँ
हर तरफ तेरे आँखों की मंजर सी है||
बहुत अच्छा।
Superb collection Praveen ji…