मैं अनेक बास्नाओ को प्राणपन से चाहता हूँ,
तुने मुझे उनसे बंचित रख, बचा लिया|
तेरी यह निष्ठुर दया मेरे जीवन के कण कण में ब्याप्त है|
तुने आकास, प्रकाश,देह, मन, प्राण, बिना मांगे दिए है|
प्रतिदिन तू मुझे इस महादान के योग्य बना रहा है|
अति इच्छा के संकट से उबार कर|
मैं कभी रह भुला सा, कभी तेरी रह पकडे-सा
तेरी ओर लछित चलता हूँ|
निष्ठुर!तू मेरी आँखों की ओटहो जाता है|
यह तेरी दया है, इस रहस्य को मैं जान गया|
तू मुझे अपनाने के लिए ठुकराता है|
मेरा जीबन परिपूर्ण करके तू अपने योग्य बना रहा है|
अधूरी इच्छाओ के संकट से उबरकर|