“बिपतियों से रछा कर” – यह मेरी प्राथना नहीं,
मैं बिपतियों से भयभीत न होऊं!
अपने दुःख से ब्यथित चित को सांत्वना देने की भिछा
नहीं मांगता, मैं दुखो पे बिजय पाऊं !
यदि सहयता न जुटे तो भी मेरा बल न टूटे|
संसार से हनी ही मीले, केवल बांचना ही पाऊं
तो भी मेरा मन उसे छति न माने!
“मेरा त्राण कर” यह प्राथना नहीं,
मेरी तैरने को शक्ति बनी रहे|
मेरा भार हल्का करके मुझे सांत्वना न दे,
यह भार बहन करके चलता रहूँ|
सुख भरे छनो में नतमस्तक मैं तेरा मुख पहचान पाऊं,
किन्तु दुःख -भरी रातों में जब सारी दुनिया मेरी बांचना करे,
तब भी मैं तेरे प्रति शंकित न होऊं!
विपत्तियों से रक्षा कर” यह मेरी प्रार्थना नहीं
मैं विपत्तियों से भयभीत न होऊं
वर्षों पहले ‘नवनीत’ ने पाठकों से -’मेरा जीवन कैसे सुखी होगा’ इस पर विचार मांगे थे.तब मैंने लिखा था-जीवन में कष्ट और बाधाएं स्वाभाविक रूप से आती रहें और मैं उन पर विजय पाता रहूँ, तब मैं सुखी हूँगा-अत्यन्त सुखी.
thank u