जाने के दिन मैं यही बात कहता जाऊं की जो कुछ मैंने
देखा, पाया, उसकी उपमा नहीं थी||
इस प्रकाशमय सरोबर के कमल का मधुर मधु मैंने चखा है,
मैं उसे पीकर धन्य हुआ हूँ|
बिश्व के क्रीडागृह में मैंने अनेक खेल खेले है, दोनों नेत्रों से
मैंने अमित सौन्दर्य का पान किया है|
जिसका स्पर्स अस्म्भब है, उसने मेरे शरीर
में समाकर मेरे प्राणों को पुलकित किया है|
अब यहीं मेरा अंत करना चाहते है, तो कर दे-
जाने के दिन मैं यही घोषित करू की जो कुछ मैंने
देखा व पाया है वह अतुल्य है|
जाने की दिन मैं यही बात कहता- लेखन: गुरुदेव रबिन्द्रनाथ ठाकुर
February 13, 2009 by pravinkarn