न जाने चाँद कब उतर आये जमीं पर,
तुम सो जाओ मैं जागूँगा सुबह होने तक|
गम और खुसी, पतझर और बहार एक सिस्ल्सिला है,
एक के बाद एक आती है आदमी के मर जाने तक|
क्या पता किस ने देखा है उसे कैसा है वो,
हम खवाबो में बुलाएँगे उसे सपने टूट जाने तक|
बिखरे परे है सूखे दरख्तों के पते यहाँ वहां,
चलो बहारो के खवाब सजाये बहार आने तक|
आज आरजू है तुझ को समझाने आया हूँ,
क्या पता ये खावाहिस जिन्दा रहे न रहे तुझ को समझ आने तक|
बैठा हूँ खवाब सजाये, साँस रोके, दिल को थामे हुए,
जहाँ कहा था तुमने, इन्त्जात करो मेरा, मेरे वापस आने तक|
मना है दूर बो, न पहुचेगा मेरा अश्क वहां,
मैं बैठा हु यहाँ रोने उसको खबर होने तक|
तुम्हे पूजता हूँ मैं, दिल में हो तुम मेरे,
तुम जिन्दा हो मेरे साथ, मेरा सांस होने तक|
हे भगवन तुम मालिक हो तीनो जाहन के,
देखू क्या हाल होता है मेरा, तुम्हे मेरी याद आने तक|
ईशवर से : लेखन प्रवीन कुमार कर्ण
अप्रैल 13, 2010 Pravin Kumar karn द्वारा
jiski rachna itni sundar wo dil kitna sundar hoga, agar kisi aur ka copy kiya hoga to wo bara chhuchhundar hoga.