एक बूंद का प्यास,
जो समंदर से न बुझ सका|
एक अधुरा ख्वाब,
जो आँखों से न हट सका|
छोर आया हूँ उसे मैं आज पीछे,
अनजानी डगर पर आँख मिचे|
नयी मंजिल को पंहुचा हु,
न जाने क्या क्या छोर पीछे|
पुराने ख्वाबो को,
नए सपनो से ढक लिया है मैंने|
पुराने निब पर,
नया महल बना दिया है मैंने|
रौशनी जो आँखों को अन्धा करदे,
ऐसी चराग बुझा दिया है मैंने|
न पूछ एक खुसी के खातिर,
कितने गम उठा लिया है मैंने|
Haath mein plastic ka cover jarur lagaiyega nahi to gam se chipak sakta hai..