मोती के बूंद सा
पल पल सजा जिन्दगी का धार|
हंसोहंसाओ और मुस्कुराओ
करो जीवन का सोलह सिंगार|
झूम के गाओ नाचो
ये जीवन है राग मल्हार|
पतझर में न उदास हो
आगे फिर है मौसम बहार|
Archive for the ‘My Own’ Category
Pravin Kumar Karn
Posted in My Own on August 29, 2009 | Leave a Comment »
सबसे बरा धोका by : Pravin Kumar Karn
Posted in My Own on March 27, 2009 | Leave a Comment »
मेरा ख्याल था ऐ दिन
तुम कुछ इस तरह मीलोगे
मैं रात के साये से डर के
तुम्हारा इन्तजार करूँगा
तेरे लिए सपनो का महल बनाऊंगा
फिर हर तरफ रोशनी होंगी
तेरे रोशनी में हर बाग़ खिल उठेंगे|
तुम मिले तो कुछ इस तरह
तुझ में इतनी गर्मी थी की
बार के बाग़ जल उठे
सारे सपनो का जनाजा निकला
तू खुद सबसे बरा धोका निकला
मैं [...]
बन के जादू तू
Posted in My Own on March 1, 2009 | 1 Comment »
मुझ से बिछर के तू
मेरे और करीब आगया है
मेरे नजरो से ओझल तू
मेरे दिल में समा गया है|
एक एक कतरा खुसी
तुने संजोये मेरे लिए
मेरे दुखो में अपने
आँख भिगोये मेरे लिए
आज नजर बन के तू
मेरे आँखों में समां गया है|
आज बन के तू आस्मा
मुझ पे प्यार बरसा रहा है
बदलो की गरज के साथ
तू मुझे बुला रहा [...]
तेरे आँखों की मंजर – लेखन :- प्रवीन कुमार कर्ण
Posted in My Own on September 7, 2008 | 2 Comments »
मुस्कुराहटो के बीच एक थकन सी है |
हर पल में एक चुभन सी है|
न जाने कहा को चला है ये करवा
हर हमसफ़र के चेहरे पे एक उलझन सी है|
मंजिल है क्या, कौन सा रास्ता है आगे
जहां निगाह जाये सुखी जंगल सी है|
हर जुवान से निकलती है अपनी दास्ताँ
हर दिल में छुपी एक जलन सी है|
वो [...]
तुम क्या समझो गे मुझे, :-लेखक : प्रवीन कुमार कर्ण
Posted in My Own on May 18, 2008 | Leave a Comment »
तुम क्या समझो गे मुझे,
तुम तो मुझे आईने की तरह देखा है|
माघ मास की सर्द सुबह में
तुम ने मुहे नर्म धुप की तरह देखा है|
रेतीली अँधेरी आंधियो में
तुमने मुझे आसरे की तरह देखा है|
जेठ मास की गर्म धुप में
तुम ने मुझे बदलो की तरह देखा है|
तुम्हे क्या मालूम हालात ये मेरे दिल की
तुम ने तो [...]
चलो स्वप्न लोक – By Pravin Kumar Karn
Posted in My Own on February 11, 2008 | 2 Comments »
चलो देखे एक बार, हर सच को झूठ्ला कर
चलो जिए हम सपनो की दुनिया बसा कर
फिर जिए हम बिछरे हुए अपनों के बिच
चलो खो जाये हम, सपनो के बिच
दर्द के हर एक कतरे को भुला कर
उदासी पे मुस्कुराहट का चादर चढा कर
हँसे आज फिर, हर गम को भुला कर
ख्वाबो में उनको करीब बुला कर
चलो देखे [...]
दो किनारे By Pravin Kumar Karn
Posted in My Own on January 27, 2008 | 1 Comment »
नदी के दो किनारे
अगर मिल जाये तो?
मिट जायेगा असतित्व
नदी और कीनारे दोनो की
हो जायेगि अनाथ
नदी के कोख का पानी
निकल परेगि अनदेखी
अन्जानी राहो मे
भटकने के लिये
ईसी लिये जरुरी है
किनारे कभी ना मिले
हमेशा हमेशा के लिये
CHALO SWAPN LOK – By Pravin Kumar Karn
Posted in My Own on December 9, 2007 | 1 Comment »
chalo dekhe ek baar,har such ko jhuthla kar
chalo jiye hum sapno ki duniya basakar
Fir jiye hum bichre huye apno ke bich,
chalo kho jaye hum, sapno ke bich
dard ke har ek katre ko bhula kar,
udasi pe muskurahat ka chadar chada kar,
hanse aaj fir, har gam ko bhula kar,
khawabo me unko karib bulakar,
chalo dekhe ek baar,har such [...]
Difficult Choice – By Pravin Kumar Karn
Posted in My Own on October 6, 2007 | 1 Comment »
Wo dil hai mera
Aur mujhe jigar ne paalaa hai
Mere liye jaruri hai,
Mai dil se pyar karu
Aur jigar ke sath rahu
par mai janta hoo,
Aayega ek din aisaa
Jab hogi larai mere apno ke bich
Bant jayegi puri duniya
Do alag alag paato me
Mujhe karna parega chunaab,
Jine ke liye
Hona parega ek ke saath
Ya Dil ko tor kar
Ya Jigar ko chor [...]