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मैं अनेक बास्नाओ को प्राणपन से चाहता हूँ,
तुने मुझे उनसे बंचित रख, बचा लिया|

तेरी यह निष्ठुर दया मेरे जीवन के कण कण में ब्याप्त है|
तुने आकास, प्रकाश,देह, मन, प्राण, बिना मांगे दिए है|
प्रतिदिन तू मुझे इस महादान के योग्य बना रहा है|
अति इच्छा के संकट से उबार कर|

मैं कभी रह भुला सा, कभी तेरी रह पकडे-सा
तेरी ओर लछित चलता हूँ|
निष्ठुर!तू मेरी आँखों की ओटहो जाता है|
यह तेरी दया है, इस रहस्य को मैं जान गया|
तू मुझे अपनाने के लिए ठुकराता है|
मेरा जीबन परिपूर्ण करके तू अपने योग्य बना रहा है|
अधूरी इच्छाओ के संकट से उबरकर|

सूनी-सूनी ज़िंदगी की राह है,
भटकी-भटकी हर नज़र-निगाह है,
राह को सँवार दो,
निगाह को निखार दो,

आदमी हो तुम कि उठो आदमी को प्यार दो,
रोते हुए आँसुओं की आरती उतार दो।

तुम हो एक फूल कल जो धूल बनके जाएगा,
आज है हवा में कल ज़मीन पर ही आएगा,
चलते व़क्त बाग़ बहुत रोएगा-रुलाएगा,
ख़ाक के सिवा मगर न कुछ भी हाथ आएगा,

ज़िंदगी की ख़ाक लिए हाथ में,
बुझते-बुझते सपने लिए साथ में,
रुक रहा हो जो उसे बयार दो,
चल रहा हो उसका पथ बुहार दो।
आदमी हो तुम कि उठो आदमी को प्यार दो,

मुस्कुराहटो के बीच एक थकन सी है |
हर पल में एक चुभन सी है|

न जाने कहा को चला है ये करवा
हर हमसफ़र के चेहरे पे एक उलझन सी है|

मंजिल है क्या, कौन सा रास्ता है आगे
जहां निगाह जाये सुखी जंगल सी है|

हर जुवान से निकलती है अपनी दास्ताँ
हर दिल में छुपी एक जलन सी है|

वो दोस्त आरहे है मिलने आज मुदत के बाद
उनके हाथो में छुपी खंजर सी है|

टुटा कुछ सिने में तो क्या बनता ये दास्ताँ
आज जिधर देखो यही मंजर सी है|

आज फिर आरजूवो ने दिल में डेरा डाला है
आज फिर दिल में एक हलचल सी है|

आज भटकते भटकते मैं जाऊं कहाँ
हर तरफ तेरे आँखों की मंजर सी है||

‍जीवन पथ हो सुखद या दुखद जीना प्यार से
हर दिन एक सा नहीं होता यह बात जान ले

जीवन पथ पर डटकर हो तत्पर बढ़ना पथिक
मंजिल सदा उसे मिलती जो होता दृढ़ निश्चयी

लक्ष्य निर्धारित मन और मेहनतकश तन को
कोई रोक नहीं सकता सफलता सदा सुनिश्चित

समय बड़ा मूल्यवान उसे कैद करना मुश्किल
साथ दौड़ जाये जो प्रतिफल मिलना सुनिश्चित

जीवन का यही मूलमंत्र जो कर ले आत्मसात
कभी ना हारे वो चाहे हो प्रचण्ड विपरीत प्रवाह

अगले जनम में भी इतनी अच्छी रहे वो…
इतना सा बदल जाये मुझे अपना कहे वो

दुनिया का दर्द हो तो आँसू चाहे बहे वो
जब उस का दुख मिले आँखों में रहे वो

मैं सागर बन जायूं वो लहर नदी की..
साहिल साहिल शाम सहर साथ बहे वो

ये सिफ़त कायम रहे दिल उसका पढ़ सकूँ
कुछ भी ना सुनू मैं कुछ भी ना कहे वो

इस जनम मेरे दिल में है अगले जनम में
दिल में भी रहे वो मेरे घर भी रहे वो

इस बार की मुहब्बत तो मेरी ख़ाता है
जब प्यार करूँ मैं क्यों दर्द सहे वो

उस बात का चाहे मानी कोई ना हो
कभी कानो में मेरे इक बात कहे वो

कोई रास्ता , कोई मंजिल तोह नहीं,
कोई सागर ,कोई साहिल तोह नहीं,

राह में मिले हो चलते चलते,
ज़िन्दगी में मगर तुम शम्मिल तोह नहीं,

कर दूं दरवाज़े बंद अपने घर के तोह क्या,
दिल की धडकनों पे काबू हासिल तोह नहीं,

यह फैसला मेरा ही है तुझसे मोहाब्बत का ,
यूँ तोह तू मेरी हास्रतों के काबिल भी नहीं,

याद आता है तू हर लम्हा मुझे,
हाँ मगर तुझे भूल जाना मुश्किल तोह नहीं,

एहसास और आरजूएं यह ऊओचती है मुझसे ,
कहीं तू मेरे जस्बातों का कातिल तोह नहीं,

मेरी ज़िन्दगी की पहली मोहब्बत है तू,
मगर तू इसका मालिक तोह नहीं,

यह दागा मज़बूरी है तेरी या फिर,
बेवफाई का कहीं तू कायल तोह नहीं

सासों की सिसकियों को सुना है मैंने,
चली है मेरी रूह तेरे जिस्म में रहने,

रहने दे तनहा मुझे अंधेरे में,
की आती है तेरी पर्चियाँ वीरानो में मुझसे खेलने,

जिस्म को मेरे तू चैन की नींद सोने दे,
की ख्वाबों में अक्सर निकल जाते है हम दोनों सागर किनारे टहलने,

सदियों से लम्बी हो आज की रात यह मिलकर दुआ कर,
की चली आई हूँ में रात भर के लिए तुझसे बातें करने,

मेरे रब से मेरा मिलन देखागी यह दुनिया बाद में,
बस कुछ दिन दे इ वक़्त मुझे यह जुदाई सहने,

ख़ुशी और गम के बीच एहसासों का यह कैसा मंजार है,
लगे है आज अश्क दीवारों से बहाने,

वोह भी उदास होकर आसमान को ताकता रहता है,
चले आये है उसके कमरे के वीराने मुझसे इतना कहने,

याद आई उसे फिर मेरी ख्वाबों में कहीं,
कबर से उठके आई है मेरी रूह उससे मिलने

जिस्म से जान को मांगता है कोई,
रूह चाहती है उसे कितना यह कहाँ जानता कोई,

पल दो पल का तोह नहीं रिश्ता हमारा तुम्हारा,
मुझको लगता था सदियों का है वास्ता कोई,

तेरी हसी में गूंजता था मेरे दरोदों गम का वीराना,
लगता है लिख रहा है खुदा फिर हंसी दास्ताँ कोई,

खली खान्दर है मेरे ख्वाबों का मकान,
दर पे उसके एहसासों का रास्ता ताकता है कोई,

बनके साया में चली उसके साथ हमेशा,
मुझ से मेरी ही पहचान आज पूछता है कोई,

सूख गए है आँखों के किनारे देखो,
न यह होता जो दिल के ज़ख्मो पे हाथ फेरता कोई,

कवरी ख्वाशिओं को मेरी यूँही लूटा किसी ने,
सजाती में भी जो डोली को मेरी सजाता कोई,

दिल के आर्मानो की साँसे निकल दी उसने,
जिसकी सासों की आवाज़ से दिल धड़कता है कोई,

घुट गया है दम मेरे कमरे की दीवारों का,
ज़िन्दगी की तरफ नहीं दिखता अब उन्हें रास्ता कोई,

नींद आती तोह नहीं पलकों को आजकल मेरी ,
पर यह क्या सितम है ख्वाबों में चेहरा दिखता है कोई,

उन पलों से भीग जाता है यादों का दमन,
जिनसे गुजरने पे याद आता है वक़्त बीता कोई,

है मेरे भी जस्बातों में एक कशिश,
दिल के घर में एक उम्र तोह थराता KOI.

अगर हम अपने दिल को अपना इक चाकर बना लेते
तो अपनी ज़िदंगी को और भी बेहतर बना लेते

ये काग़ज़ पर बनी चिड़िया भले ही उड़ नही पाती
मगर तुम कुछ तो उसके बाज़ुओं में पर बना लेते

अलग रहते हुए भी सबसे इतना दूर क्यों होते
अगर दिल में उठी दीवार में हम दर बना लेते

हमारा दिल जो नाज़ुक फूल था सबने मसल डाला
ज़माना कह रहा है दिल को हम पत्थर बना लेते

हम इतनी करके मेहनत शहर में फुटपाथ पर सोये
ये मेहनत गाँव में करते तो अपना घर बना लेते

‘कुँअर’ कुछ लोग हैं जो अपने धड़ पर सर नहीं रखते
अगर झुकना नहीं होता तो वो भी सर बना लेते..

तुम क्या समझो गे मुझे,
तुम तो मुझे आईने की तरह देखा है|

माघ मास की सर्द सुबह में
तुम ने मुहे नर्म धुप की तरह देखा है|

रेतीली अँधेरी आंधियो में
तुमने मुझे आसरे की तरह देखा है|

जेठ मास की गर्म धुप में
तुम ने मुझे बदलो की तरह देखा है|

तुम्हे क्या मालूम हालात ये मेरे दिल की
तुम ने तो मुझे सिर्फ हँसते हुए देखा है||

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