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Archive for जनवरी, 2017

मीत मेरे मन मीत मेरे।

शब्द संगीत के रचना में
तुझ को मैं नही समा पाता हूँ,
लघु है मन मस्तिष्क मेरा
तुझ को मैं अनन्त पाता हूँ।
गढू किस मिट्टी से तेरा मूरत
कैसे उतारूँ तेरा सूरत,
मैं कल्पना के सागर में निरन्तर गोता लगाता हूँ
तुझ को मैं अकल्पनीय पाता हूं।
मीत मेरे मन मीत मेरे।
गाऊं कौन सा गान
लगाऊं कौन सुर तान,
कैसे पहचाऊं आवाज तुम तक
तुझ को असाध्य पाता हूँ।
मीत मेरे मन मीत मेरे।
अनन्त तुम हो, सुछ्म भी तुम हो
सागर तुम हो, बून्द भी तुम हो,
काब्य महाकाब्य तुम हो, पूर्ण विराम बिंदु भी तुम हो
समस्त शास्त्र सुर तान तुम हो, निर्बल का आवाज भी तुम हो।
मीत मेरे मन मीत मेरे,
मेरे लघुता में तु सुछ्म बन के बस
शब्द बन के मेरे, रचना तु रच
मीत मेरे मन मीत मेरे।
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तुम समंदर, मैं लहर

कभी सान्त समंदर में
कोलाहल सा मचाता हूं
मैं लहर हूँ, किनारों से टकराता हूँ
समुन्दर में लौट आता हूँ ।

कभी ज्वारभाटा बन के
आसमानों से बतियाता हूँ
तूफ़ान बन के कभी कभी
मैं कहर ढाता हूँ।

बन के बारिष कभी
मैं धरती पे छा जाता हूँ
नदी तलाब ताल तलैया बन के
समुन्दर मैं लौट आता हूँ।

बारिष, तूफ़ान ज्वारभाटा
है छनिक जो टिक नही पता
मेरा तेरा प्रेम अमर है
लहर समंदर का मेल अमर हैं।

जिबन के भटकाब का
तू ही अंत ठिकाना है
लहर उठे कितना भी ऊंचा
समंदर में मिल जाना है।goa

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