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Archive for the ‘My Own’ Category

मीत मेरे मन मीत मेरे।

शब्द संगीत के रचना में
तुझ को मैं नही समा पाता हूँ,
लघु है मन मस्तिष्क मेरा
तुझ को मैं अनन्त पाता हूँ।
गढू किस मिट्टी से तेरा मूरत
कैसे उतारूँ तेरा सूरत,
मैं कल्पना के सागर में निरन्तर गोता लगाता हूँ
तुझ को मैं अकल्पनीय पाता हूं।
मीत मेरे मन मीत मेरे।
गाऊं कौन सा गान
लगाऊं कौन सुर तान,
कैसे पहचाऊं आवाज तुम तक
तुझ को असाध्य पाता हूँ।
मीत मेरे मन मीत मेरे।
अनन्त तुम हो, सुछ्म भी तुम हो
सागर तुम हो, बून्द भी तुम हो,
काब्य महाकाब्य तुम हो, पूर्ण विराम बिंदु भी तुम हो
समस्त शास्त्र सुर तान तुम हो, निर्बल का आवाज भी तुम हो।
मीत मेरे मन मीत मेरे,
मेरे लघुता में तु सुछ्म बन के बस
शब्द बन के मेरे, रचना तु रच
मीत मेरे मन मीत मेरे।
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तुम समंदर, मैं लहर

कभी सान्त समंदर में
कोलाहल सा मचाता हूं
मैं लहर हूँ, किनारों से टकराता हूँ
समुन्दर में लौट आता हूँ ।

कभी ज्वारभाटा बन के
आसमानों से बतियाता हूँ
तूफ़ान बन के कभी कभी
मैं कहर ढाता हूँ।

बन के बारिष कभी
मैं धरती पे छा जाता हूँ
नदी तलाब ताल तलैया बन के
समुन्दर मैं लौट आता हूँ।

बारिष, तूफ़ान ज्वारभाटा
है छनिक जो टिक नही पता
मेरा तेरा प्रेम अमर है
लहर समंदर का मेल अमर हैं।

जिबन के भटकाब का
तू ही अंत ठिकाना है
लहर उठे कितना भी ऊंचा
समंदर में मिल जाना है।goa

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ख्वाहिस By: Pravin Kumar Karn

बारिस की
पहली बूँद के साथ
तपती धरती के सिने से
उठती खुसबु,

 

जवानी के

दहलीज पे
रखी कदमो का
पहला आरजू|

 

सूरज के किरण की
पहली लाली,
जिसके आने से पहले
दिल रहा था खाली|

 

बहारो के मौसम का
पहला फूल,
ना जाने कैसे

कर गये हम भूल|

 

बूंदे फिर बारिस
फिर बिजली की घनघन,
किस तरह सहमे थे
कितना डरा था मन|

 

दोपहर की दहकती
गर्म किरण,
आरजूओ के बीच
थी एक जलन|

 

फुलो का खिलना
खिलके मुरझना,
कभी तुझ से मिलना
मिलके बिचछरणा|

 

वो बारिस के थमने के
बाद का सन्नाटा,
हम जो तरसे थे
पानी को ज़रा सा|

 

कितनी सुहानी थी
साम का मंज़र,
कैसे जिए थे
हम तुम बिछर कर|

 

पतझर का मौसम
भी आया वाहा पर,
लगाए थे बगीचे
हम ने जहाँ पर|

 

वो पहले सपने
वो पहला आरजू,
कभी गर हो फ़ुर्सत
हो लेना रूबरू|

 

रही गर धरती
फिर आएगी बारिस,
मगर क्या तब तक
जिंदा रहेगी ये खावहिस|

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2015 in review

The WordPress.com stats helper monkeys prepared a 2015 annual report for this blog.

Here’s an excerpt:

A San Francisco cable car holds 60 people. This blog was viewed about 1,000 times in 2015. If it were a cable car, it would take about 17 trips to carry that many people.

Click here to see the complete report.

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राजनैतिक ओहदों का ना कर तूँ अहंकार

जनता के सामने झुंकना पड़ा है अनैतिकता को बार बार

अपनों का कैसे कर सकते हो तिरिष्कार

इस मिट्टी पे न्योछावर है हर एक रक्त की धार

प्रचंड प्रलभ था हमारे पूर्वजो का प्रहार

जिसकी देन है हमारे देश की वर्तमान जीवंत आकार

राजनैतिक ओहदों का ना कर तूँ अहंकार

जनता के सामने झुंकना पड़ा है अनैतिकता को बार बार

 

 

 

आज मिट्टी कर रही है पुकार

सांसें दे रही ज़िन्दगी को दुत्कार

वेदभाव को हम करते हैं इंकार

करना है तो पुरे सम्मान के साथ करो हमे स्वीकार

राजनैतिक ओहदों का ना कर तूँ अहंकार

जनता के सामने झुंकना पड़ा है अनैतिकता को बार बार

 

 

 

है इतिहास साक्षात्कार

दुर्योधन ना निकाल पाया मन से विकार

पांच पांडवो से हुई सो कौरव की हार

राजनैतिक ओहदों का ना कर तूँ अहंकार

जनता के सामने झुंकना पड़ा है अनैतिकता को बार बार

 

 

 

 

सोच समझ के कर तूँ विचार

बंद करो, बंद करो, अब तो ये अत्याचार

साक्षात पक्षपात की नहीं चलने देंगे कारोबार

राजनैतिक ओहदों का ना कर तूँ अहंकार

जनता के सामने झुंकना पड़ा है अनैतिकता को बार बार

 

 

 

तूँ हवा को क्या रोकेगा

तूँ फ़िज़ा को क्या बदलेगा

समुन्दर की धार है हम

इस देश की आन, मान और शान है हम

मधेशी है हम, मधेशी है हम

जय मधेश ! !!

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तुम दिवाली मनाओ
हमारी लाशो पे,
हम हार का गम नहीं मनाएंगे
जीवन तो संघर्ष है
हम संघर्ष किये जाएंगे ।

जीत की उन्माद तुम्हे मुबारक
रावण की अट्टहासह तुम्हे मुबारक

द्रौपदी भी थी कभी रोई
सीता भी कभी गयी थी हरी
अभिमन्यु बध्ध अंत नहीं
महाभारत बिजय तुरंत नहीं ।

राम का आगमन है अभी शेष
कृष्ण का सुदर्शन कब हुवा निस्तेज

चक्रबियुह अब सब टूटेगा
अँधियारा का दुष्चक्र मिटेगा
मधेश अब न दमन सहेगा
मधेश जागृत होके रहेगा ।

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तुम पिसाच
पर हम ग्रास नही
मधेश किसी का
दास नही।

रक्त जंजित तुम
हम शान्ति पुजारी
धैर्य को हमारी
न समझो कमजोरी

हम दुर्गा काली
के है उपासक
दुश्मन के हम
समूल नासक

भूल किया तो
छमा देंगे
कपटी को हम
निर्मूल करेंगे

मधेस अब है
जागृत भाई
पूछे कोई कौन हो भाई
गर्ब से कहेंगे मधेश है मेरी माई।

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