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तुम दिवाली मनाओ
हमारी लाशो पे,
हम हार का गम नहीं मनाएंगे
जीवन तो संघर्ष है
हम संघर्ष किये जाएंगे ।

जीत की उन्माद तुम्हे मुबारक
रावण की अट्टहासह तुम्हे मुबारक

द्रौपदी भी थी कभी रोई
सीता भी कभी गयी थी हरी
अभिमन्यु बध्ध अंत नहीं
महाभारत बिजय तुरंत नहीं ।

राम का आगमन है अभी शेष
कृष्ण का सुदर्शन कब हुवा निस्तेज

चक्रबियुह अब सब टूटेगा
अँधियारा का दुष्चक्र मिटेगा
मधेश अब न दमन सहेगा
मधेश जागृत होके रहेगा ।

तुम पिसाच
पर हम ग्रास नही
मधेश किसी का
दास नही।

रक्त जंजित तुम
हम शान्ति पुजारी
धैर्य को हमारी
न समझो कमजोरी

हम दुर्गा काली
के है उपासक
दुश्मन के हम
समूल नासक

भूल किया तो
छमा देंगे
कपटी को हम
निर्मूल करेंगे

मधेस अब है
जागृत भाई
पूछे कोई कौन हो भाई
गर्ब से कहेंगे मधेश है मेरी माई।

सींच दो खेत खलिहानों को
खून की धारा बहने दो
मातृभूमि पूजन उत्सब है
बलिदान आज होने दो।

टूटने दो सब जंजीरे
खुलने दो हर दरवाजे
स्वत्रंता की हवा है चली
मुक्त फजा होने दो।

मुश्किल है जो आन पड़ी
दमन का है जो कू चक्र चली
तोर दो बाँध , तोर दो दीवारे
मुक्त गंग धारा बहने दो।
बलिदान आज होने दो।

है मधेश बीर भूमि
जनक राजर्शी, बुध की भूमि
पुरषार्थ की है बेला आई
आगे बढ़ो मधेशी भाई

टूट जाए जो हम से टकराए
कुचल जाए जो राह मे आए
काट जाए तो गम नही है
सर को नही अब झुकने दो
बलिदान आज होने दो।

Where hEaRT Speaks

हर पूजा में मैंने तुझे चाहा है ठगना

हर फूल के अर्पण में मैने
इच्छा आकांछा ओ का ब्यपार किया है।

तू मगर नाराज नहीं होता
बिना मांगे तू देता है
बिना मूल्य तू देता है,

पर मैं निरंतर करता हूँ पर्यत्न
चाहता हूँ तुझे ठगना
जो तेरा है वही तुझे अर्पण कर
मैंने तेरा उपहास किया है।

तू मगर नाराज नही होता
तू मुस्कुराता है और
मुझ से फरेब खाता है,

जब करता हूँ में तेरी बंदना
मनमे छुपि रहती मनकामना
पर तू मेरे मनके कपट को
कभी जी में नहीँ धरता है।

मै छलिया , तू पालन हारे है।

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हर पूजा में मैंने तुझे चाहा है ठगना

हर फूल के अर्पण में मैने
इच्छा आकांछा ओ का ब्यपार किया है।

तू मगर नाराज नहीं होता
बिना मांगे तू देता है
बिना मूल्य तू देता है,

पर मैं निरंतर करता हूँ पर्यत्न
चाहता हूँ तुझे ठगना
जो तेरा है वही तुझे अर्पण कर
मैंने तेरा उपहास किया है।

तू मगर नाराज नही होता
तू मुस्कुराता है और
मुझ से फरेब खाता है,

जब करता हूँ में तेरी बंदना
मनमे छुपि रहती मनकामना
पर तू मेरे मनके कपट को
कभी जी में नहीँ धरता है।

मै छलिया , तू पालन हारे है।

कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था
भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था

स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा
स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था
ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों को
एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

बादलों के अश्रु से धोया गया नभ-नील नीलम
का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम
प्रथम ऊषा की किरण की लालिमा-सी लाल मदिरा
थी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला सम
वह अगर टूटा मिलाकर हाथ की दोनों हथेली
एक निर्मल स्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

क्या घड़ी थी, एक भी चिंता नहीं थी पास आई
कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी न छाई
आँख से मस्ती झपकती, बात से मस्ती टपकती
थी हँसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई
वह गई तो ले गई उल्लास के आधार, माना
पर अथिरता पर समय की मुसकराना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

हाय, वे उन्माद के झोंके कि जिनमें राग जागा
वैभवों से फेर आँखें गान का वरदान माँगा
एक अंतर से ध्वनित हों दूसरे में जो निरंतर
भर दिया अंबर-अवनि को मत्तता के गीत गा-गा
अंत उनका हो गया तो मन बहलने के लिए ही
ले अधूरी पंक्ति कोई गुनगुनाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

हाय, वे साथी कि चुंबक लौह-से जो पास आए
पास क्या आए, हृदय के बीच ही गोया समाए
दिन कटे ऐसे कि कोई तार वीणा के मिलाकर
एक मीठा और प्यारा ज़िन्दगी का गीत गाए
वे गए तो सोचकर यह लौटने वाले नहीं वे
खोज मन का मीत कोई लौ लगाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

क्या हवाएँ थीं कि उजड़ा प्यार का वह आशियाना
कुछ न आया काम तेरा शोर करना, गुल मचाना
नाश की उन शक्तियों के साथ चलता ज़ोर किसका
किंतु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि, तुझे होगा बताना
जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से
पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

सर्म शार हुयी मानवता

घर घर में लुटती आज सीता,

मानव दानव में भेद नहीं है

ये कैसा धर्मं है?

 

जिस ह्रदय में मानव प्रेम नहीं है

उस ह्रदय में इस्वर कब बसते है ,

कर्म नहीं पर धर्म की बातें ,

ये कैसा धर्मं है?

 

कहते है सत्य नारायण

सत्य से कही मेल नहीं है,

परोपकार को भूल मानव,

इर्ष्या द्वेष  से भरे है

ये कैसा धर्मं है?

 

धर्मं आचरन कही नहीं है,

धर्मं के नाम पे खून बही है,

धर्म ,इस्वर की बाते करके,

मानव ने मानव ठगे है,

ये कैसा धर्मं है?

 

मानवता हुयी दानवता

नफरत की सिख भर रही हवा में,

अधर्म ने ली नाम धर्मं का,

धर्म धुरंधर आज लिप्सा में लीन है,

ये कैसा धर्मं है?

 

सत्य ,अहिंसा, परोपकार

मिट गया सब बस है अंधकार,

मानव मानव सत्रु बने है,

धर्म ध्वज आज मलिन है ,

ये कैसा धर्मं है?

 

लेखक : प्रवीण कुमार कर्ण

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